बुधवार 13 मई 2026 - 09:46
क्या जिहाद की आयतें 'ला इकराहा फ़िद्दीन के अनुकूल हैं?

'दिल से ईमान लाने' और 'आत्मरक्षा' के बीच मूलभूत अंतर है। इस्लाम में जिहाद, धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा और अत्याचार का सामना करने का एक तरीका है, न कि विचार थोपने का कोई हथियार।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आयत 'لا اکراه فی الدین' और जिहाद की आयतों के बीच संबंध का प्रश्न, एक महत्वपूर्ण और बार-बार उठने वाला संदेह है, जो हमेशा धार्मिक और विश्वास संबंधी चर्चाओं में उठाया जाता है। इस प्रश्न का महत्व इसलिए है क्योंकि इसका उत्तर, इस्लाम में शरीयत के तर्क, धर्म और चुनने की स्वतंत्रता के संबंध, तथा इस्लाम धर्म के मूलभूत सिद्धांतों जैसे न्याय, मानवीय गरिमा, विधान के तर्क, धर्म की प्रकृति और उसके अनुयायियों के साथ उसके व्यवहार के तरीके की हमारी गहरी समझ और जिहाद के इस्लामी शिक्षाओं में स्थान को समझने में सहायक होता है। इस संदेह का स्पष्ट उत्तर खोजने के लिए, हमने शंकाओं के उत्तर देने वाले विशेषज्ञ हुज्जतुल-इस्लाम रज़ा पार्चेबाफ़ से एक बातचीत की है, जिसका पाठ आगे आप प्रिय पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं।

प्रश्न : क़ुरआन कहता है: "धर्म में कोई ज़बरदस्ती नहीं।" फिर हमारे पास ऐसी आयतें क्यों हैं जो मुशरिकों के साथ युद्ध करने के बारे में कहती हैं? और जिहाद, जो धर्म के स्तंभों में से एक है, इस सिद्धांत (ज़बरदस्ती का न होना) के साथ कैसे मेल खाता है?

हुज्जतुल-इस्लाम पार्चेबाफ़ का उत्तर:

क्या जिहाद की आयतें 'ला इकराहा फ़िद्दीन के अनुकूल हैं?

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्राहीम

इस प्रश्न के उत्तर में कि यदि अल्लाह तआला क़ुरआन में फरमाता है: 'لا إکراه فی الدین' (धर्म में किसी भी प्रकार की ज़बरदस्ती नहीं), तो फिर जिहाद और मुशरिकों से संघर्ष से संबंधित आयतों के उतरने का दर्शन क्या है और जिहाद इस्लाम के महत्वपूर्ण आदेशों में से एक क्यों माना जाता है? इस पर एक मूलभूत बात पर ध्यान देना ज़रूरी है; असल मामला यह है कि 'ईमान लाने' और 'जिहाद' के बीच मौलिक अंतर है।

पवित्र आयत 'لا إکراه فی الدین' धर्म को अपनाने और हृदयगत विश्वास के क्षेत्र से संबंधित है; इसका अर्थ यह है कि अल्लाह तआला ज़ोर देकर कहता है कि किसी को भी ज़बरदस्ती और दबाव से हृदयगत विश्वास और सच्चे ईमान पर नहीं लाया जा सकता, क्योंकि ईमान पूरी तरह से एक आंतरिक और हृदय संबंधी मामला है।

मनुष्य को दबाव में लाकर कुछ ज़बान से कहलवा दिया जा सकता है, लेकिन जब तक उसका दिल उसे नहीं मान लेता, तब तक वास्तविक ईमान प्राप्त नहीं होता। इसलिए, इस आयत का अर्थ यह है कि इस्लाम किसी को भी ज़बरदस्ती किसी विश्वास और धारणा पर नहीं लाना चाहता; क्योंकि ज़बरदस्ती से आया हुआ विश्वास मूलतः बेकार (बिना मूल्य का) होता है। केवल वही ईमान मूल्यवान है जो समझ, जागरूकता और अपनी मर्जी व चुनाव पर आधारित हो।

लेकिन सवाल यह है कि यदि सिद्धांत स्वतंत्रता पर है, तो फिर जिहाद की आयतें किस लिए हैं? संघर्ष क्यों किया जाना चाहिए? इस भाग का उत्तर देने के लिए, हमें उन परिस्थितियों पर ध्यान देना चाहिए जिनमें ये आयतें उतरीं। इस्लाम के शुरुआती दौर में, मुशरिकों का मुसलमानों से केवल विचारात्मक मतभेद नहीं था, बल्कि वे उन्हें बहुत सताते थे, यातनाएँ देते थे, उनके घरों से निकाल देते थे, उनका माल लूट लेते थे और यहाँ तक कि मुस्लिम समाज को पूरी तरह नष्ट करने के लिए युद्ध पर उतर आए थे।

इसलिए, जिहाद की आयतें ऐसे माहौल में उतरीं जहाँ दुश्मन ने तलवार उठा ली थी, न कि ऐसे माहौल में जहाँ सिर्फ़ एक मामूली विचारात्मक मतभेद हो। अगर धर्म में ज़बरदस्ती करने का सिद्धांत होता, तो क़ुरआन साफ़ तौर पर ऐसा हुक्म देता, लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है।

अल्लाह तआला क़ुरआन में फरमाता है: "और यदि वे तुमसे युद्ध करें तो तुम भी उनसे युद्ध करो, किंतु अत्याचार मत करो।" इसलिए, जिहाद का अर्थ विचार, धारणा या धर्म थोपना नहीं है; बल्कि इसका उद्देश्य आक्रमण से रक्षा और अत्याचार का सामना करना है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस्लाम ने इन दोनों मामलों के बीच अंतर किया है: विचार थोपना और अत्याचार का सामना करना पूरी तरह से अलग-अलग हैं। हम अत्याचार और दुश्मन के हमलों का सामना करते हैं, लेकिन हम अपना विचार थोपने के पक्ष में नहीं हैं।

इस्लाम इस बात पर ज़ोर देता है कि किसी को भी मुसलमान बनने पर मजबूर न करें; क्योंकि सिद्धांत यह है: "لا اِکراه فی الدین" (धर्म में कोई ज़बरदस्ती नहीं)। लेकिन यदि कोई समूह अत्याचार, यातना, हत्या और युद्ध के द्वारा लोगों के जीने का अधिकार, सुरक्षा और स्वतंत्रता छीनने पर तुल जाए, तो उसके खिलाफ़ शक्तिशाली होकर खड़ा होना चाहिए। वास्तव में, इस्लाम में युद्ध इसलिए निर्धारित किया गया है ताकि मुस्लिम समाज के विनाश को रोका जा सके, न कि विचार थोपने के लिए। उद्देश्य यह है कि मोमिन लोग दबाव और यातनाओं के तहत नष्ट न हो जाएं और लोगों के सामने मार्गदर्शन और स्वतंत्र चुनाव का रास्ता बंद न हो। यदि कोई समूह अत्याचार के द्वारा लोगों के लिए सत्य तक पहुँचने का रास्ता बंद करना चाहते हैं, तो मुसलमानों का कर्तव्य है कि वह रास्ता खोलें, बिना यह चाहे कि अपने धर्म को ज़बरदस्ती दूसरों पर थोपें।

कभी-कभी यह समझा जाता है कि जिहाद का अर्थ यह है कि लोगों को तलवार के ज़ोर पर मुसलमान बनाया जाए, जबकि यह धारणा पूरी तरह गलत है। यदि इस्लाम का उद्देश्य सभी को मुसलमान बनने पर मजबूर करना होता, तो क्या इसका कोई मतलब बनता कि पूरे इतिहास में, मसीही और यहूदी जैसे अन्य धर्मों के अनुयायी इस्लामी भूभागों में जीवित रहते और बने रहते? इन अनुयायियों का बने रहना यह दर्शाता है कि ईमान में ज़बरदस्ती का सिद्धांत नहीं रहा है। इस्लाम में युद्ध, फ़ितने (उपद्रव) को मिटाने, अत्याचार का मुकाबला करने और ज़ालिमों का रास्ता रोकने के लिए है, न कि लोगों के दिलों पर ज़बरदस्ती करने के लिए।

दूसरी बात यह है कि इस्लाम में जिहाद केवल सैन्य युद्ध का नाम नहीं है; यह एक सीमित दृष्टिकोण है। इस्लामी शिक्षाओं में जिहाद के बहुत व्यापक अर्थ हैं; जैसे 'जिहाद-ए-नफ़्स' (गलत इच्छाओं के खिलाफ़ संघर्ष) और 'वैज्ञानिक और सांस्कृतिक जिहाद' (सत्य के प्रसार और अज्ञानता तथा भ्रष्टाचार के मुकाबले के लिए प्रयास)। इसलिए, जब हम कहते हैं कि जिहाद धर्म के महत्वपूर्ण मामलों में से है, तो हमें केवल इसके सैन्य पहलू पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए।

अंतिम निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है:

पहला: आयत 'ला इकराह फिद्दीन' बताती है कि ईमान ज़बरदस्ती वाला नहीं है और किसी को भी ज़बरदस्ती से मोमिन नहीं बनाया जा सकता।

दूसरा: जिहाद की आयतें कहती हैं कि यदि दुश्मन मुस्लिम समाज के विनाश और मोमिनों को सताने पर तुल जाए, तो मुसलमानों को अपनी रक्षा करने का अधिकार है, बल्कि यह उनका कर्तव्य है।

इसलिए, ये दो विषय न केवल एक-दूसरे के विपरीत हैं, बल्कि प्रत्येक अपने स्थान पर सही अर्थ रखता है: एक 'विचार चुनने की स्वतंत्रता' के बारे में है और दूसरा 'अत्याचार और आक्रमण के विरुद्ध रक्षा की अनिवार्यता' के बारे में।

वास्तव में, कई मामलों में जिहाद इसी 'धर्म चुनने की स्वतंत्रता' को बनाए रखने के लिए होता है। यदि मुसलमान अपनी रक्षा नहीं करते, तो दुश्मन लोगों तक सत्य की आवाज़ को भी पहुँचने नहीं देते, फिर यह तो दूर की बात है कि लोग स्वतंत्र रूप से अपना धर्म चुन सकें। इसलिए हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि इस्लाम न तो विचारों में ज़बरदस्ती का धर्म है और न ही अत्याचार के सामने समर्पण का धर्म; इस्लाद विश्वास के मामले में ज़बरदस्ती को स्वीकार नहीं करता और आक्रमण के सामने भी चुप नहीं बैठता।

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